Prasar Bharati

“India’s Public Service Broadcaster”

Pageviews

KEY MEMBERS – AB MATHUR, ABHAY KUMAR PADHI, A. RAJAGOPAL, AR SHEIKH, ANIMESH CHAKRABORTY, BB PANDIT, BRIG. RETD. VAM HUSSAIN, CBS MAURYA, CH RANGA RAO,Dr. A. SURYA PRAKASH,DHIRANJAN MALVEY, DK GUPTA, DP SINGH, D RAY, HD RAMLAL, HR SINGH, JAWHAR SIRCAR,K N YADAV,LD MANDLOI, MOHAN SINGH,MUKESH SHARMA, N.A.KHAN,NS GANESAN, OR NIAZEE, P MOHANADOSS,PV Krishnamoorthy, Rafeeq Masoodi,RC BHATNAGAR, RG DASTIDAR,R K BUDHRAJA, R VIDYASAGAR, RAKESH SRIVASTAVA,SK AGGARWAL, S.S.BINDRA, S. RAMACHANDRAN YOGENDER PAL, SHARAD C KHASGIWAL,YUVRAJ BAJAJ. PLEASE JOIN BY FILLING THE FORM GIVEN AT THE BOTTOM.

Tuesday, February 20, 2018

ROMANCING THE AIRWAVES WITH VOICE AND MODULATION


Radio's obituary, it now appears, may have been premature. It’s reassuring that radio has absorbed new technologies in the last decade to emerge stronger. The power of the human voice can never fade away. It crackles, waffles and at times makes garbled noises. But when it reaches your ears, it fires up your imagination. An invention that broke language and cultural barriers and melted geographical boundaries much before any other technology. It globalised humanity and humanised the world. It served its masters voice and has been shaping global geo-political contours. If not, for the World Radio Day celebrations, this past week, the existence of the humble radio would have largely gone unnoticed. 

20 Feet Long And 14 Feet High Radio In Bhopal


ये है कबाड़ें से बना 20 फीट लंबा और 14 फीट ऊंचा रेडियो, यहां करेगा लोगों को एंटरटेन

भोपाल. नगर निगम रोशनपुरा चौराहे पर एक रेडियो लगा रहा है। इसके लिए यहां प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है। रेडियों 20 फीट लंबा और 14 फीट ऊंचा है। बता दें कि ये प्रदेश का सबसे बड़ा रेडियो हो सकता है।अभी स्वच्छ सर्वे में होगा उपयोग - खास बात यह है कि यह रेडियो 'कबाड़ से जुगाड़' का बेहतरीन उदाहरण है। 
- कबाड़ के विभिन्न सामानों से इसका निर्माण किया जा रहा है। - फिलहाल इससे पैरोडी व अन्य गानों के साथ स्वच्छता के संदेश भी प्रसारित किए जाएंगे।- स्वच्छ सर्वे के बाद इसका उपयोग इसी तरह के अन्य कार्यों के लिए होगा। - निगम स्वच्छ सर्वे में नवाचार के तहत कबाड़ खरीद रहा है। इसका उपयोग कलाकृतियां बनाकर चौराहों की सजावट में किया जाएगा।

Forwarded by :- Mitul Kansal ,kansalmitul@gmail.com

Our Bright Children - RITHIK S/o S. Ramesh, Technician, AIR,Chennai wins Silver Medal








Mr. Rithik Ramesh, (S/o Shri S RAMESH, Technician ALL INDIA RADIO Chennai) who is studying in 11th standard of Kendriya Vidyalaya Ashoknagar Chennai selected for Junior air Riflel National Squad shooters. In First ever Khelo India 2018 held at New Delhi for under 17 age group, he has won silver medal for 10 meter air rifle event for which central government will provide 5 Lakhs per annum financial assistance for 8 years under Khelo India. He has won 3 gold medal in 43rd Tamilnadu state shooting championship held at Chennai during July 2017. He all together has won 12 gold medals and 06 silver medals and 08 bronze medals in various competition held at national level, state level and school level shooting competition. He won gold medal in 10meter rifle shooting organised by School Game Federation of India (SGFI) national School Games 2015-16 held at Madhyapradesh. For his achievement The Late chief minister of Tamilnadu J Jayalalitha awarded him 4 Lakhs Cash Award.

It's a matter of pride for Prasar Bharati Parivar and it showers it's blessings on his bright son.

Contributed by :- Shri. T Rajrndiran, DDG(E), AIR, Chennai,airchennai4@gmail.com

M.V. Gopalaswamy who named Akashvani



"Akashvani" was first used in the context of radio by M. V. Gopalaswamy after setting up the nation’s first private radio station in his residence, "Vittal Vihar" (about 200 yards from AIR’s current location in Mysore) in 1936. Akashvani seemed to be an appropriate name for a radio broadcaster and was later adopted as All India Radio's on-air name in 1957.

Forwarded by :- Mitul Kansal ,kansalmitul@gmail.com

Suggest a Tagline contest for IRCTC. Last date : 31st March, 2018.


A clarion call to all our countrymen! Participate in the IRCTC “SUGGEST A TAGLINE” Contest. The best entry attracts a cash prize of ₹ 50,000/- (INR FIFTY THOUSAND). Please ensure you read the Terms and Conditions before submitting your entry.

Source & full details pl. click here : https://www.mygov.in/task/suggest-tagline-contest-irctc/

100.7 मेगाहर्ट्ज एफएम से हुआ आकाशवाणी लखनऊ का पुनर्जन्म

यूं तो लखनऊ आकाशवाणी केन्द्र से मेरा बचपन से ही नाता रहा है। लेकिन मेरे जेहन में एफएम आने के बाद जो यादें बसी हैं वो बहुत खास हैं। 20 अगस्त 2000 से 100.7 मेगाहर्ट्ज पर जब एफएम का प्रसारण हुआ तो इसे रेडियो के पुनर्जन्म का नाम दिया गया। यह पूरी तरह से इंटरटेनमेंट चैनल हुआ करता था। इनमें से हैलो एफएम लाइव फोन इन प्रोग्राम काफी पॉपुलर हुआ। आप यूं समझिए कि आधे घंटे के प्रोग्राम के दौरान कैसरबाग फोन एक्सचेंज ब्लॉक हो जाया करता था। हमारे पास शिकायतें आती थीं कि आपका फोन नहीं मिलता। इसके अलावा गुडमॉर्निंग लखनऊ और एफएम मेहमान कार्यक्रम ने भी उस वक्त खूब धूम मचाई थी। एफएम मेहमान के हमारे पहले मेहमान के.पी.सक्सेना थे। मैं ही तीनों प्रोग्राम का संचालन करती थी। हालांकि मैं उस वक्त ऑफिसर पद पर तैनात थी लेकिन लोग मुझे उद‌्घोषक ही समझते थे।
-रमा अरुण त्रिवेदी, प्रोग्राम हेड, दूरदर्शन

आकाशवाणी लखनऊ साहित्य और कला का पर्याय है
मैंने 1969-2002 तक लखनऊ आकाशवाणी में सेवाएं दीं। यहां की खासियत रही कि इसने कला के पारखियों को तलाशा और उन्हें खुद से जोड़ा। इस तलाश में डिग्रियों की कभी कोई जगह नहीं रही। जिसकी वजह से हमारे साथ वो लोग भी जुड़े जो कभी स्कूल तक नहीं गए। इनमें ढोलक वादक बफाती भाई जैसे कई नाम शामिल है। दूसरा यहां के प्रोग्राम के किरदार बहुत पॉपुलर हुए। जैसे पंचायत घर के रमईकाका, पलटू/ झपेटे, बालसंघ के रज्जन लाल उर्फ भैया और दीदी के किरदार। प्रोग्राम की बात करूं तो पत्र के लिए धन्यवाद और प्रसारित नाटकों को श्रोताओं का खूब प्यार मिला।
-शारदा लाल, रिटायर्ड प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव, आकाशवाणी

बेगम अख्तर को दी नई जिन्दगी:
गज़ल गायिका अख्तरी बाई फैजाबादी ने 1945 में बैरिस्टर इश्ताक अहमद अब्बासी से निकाह किया। जब दोनों के बीच शादी की बात हुई तो शर्त रखी गई कि वह संगीत से रिश्ता तोड़ लेंगी। जिस पर बेगम अख्तर राजी हो गई। लेकिन 5 साल तक आवाज की दुनिया से दूर रहने का सदमा वह बर्दाश्त न कर सकीं और बीमार रहने लगीं। हकीम और डॉक्टर की दवा ने भी कोई असर न किया, नतीजन उनकी तबियत बिगड़ने लगी। हालातों को देखकर पति और घर वालों ने आकाशवाणी में गाने की इजाजत दे दी। पहला प्रोग्राम ठीक से न गा सकने की वजह से अखबार में उनकी काबिलियत पर अंगुली उठाई गई। लेकिन उसके बाद आकाशवाणी की वजह से उन्होंने अपनी खोई पहचान वापस पा ली।
-पृथ्वी राज चौहान, स्टेशन डायरेक्टर, आकाशवाणी

हमारी शैली आज भी वही है
आकाशवाणी का अब तक का सफर बहुत शानदार रहा है। आज भी हम अपनी पुरानी शैली पर काम कर रहे हैं, शालीन भाषा का प्रयोग करना हमारी कोशिश रहती है। हमारे पुराने प्रोग्राम के नाम जरूर बदल गए हैं लेकिन कंटेंट में कोई बदलाव नहीं है।
अनुपम पाठक, हेड प्रोग्रामिंग एग्जीक्यूटिव, आकाशवाणी

साभार : नवभारत टाइम्स, 19 फरवरी 2018
श्रेय :- श्री. जावेंद्र कुमार ध्रुव जी के फेसबुक अकाउंट से

Monday, February 19, 2018

I am All India Radio Lucknow .. मैं आकाशवाणी का लखनऊ केंद्र हूं.....



बाकी सभी इमारतों की तरह मैं भी महज शहर की एक आम इमारत सा दिखता हूं। लेकिन मेरी पहचान हल्के नीले रंग से सजी दीवारों पर आकाशवाणी का प्रतीक चिन्ह और उस पर लिखा 'आकाशवाणी लखनऊ' इसे खास बनाता है। जी हां मैं आकाशवाणी का लखनऊ केंद्र हूं। वही केंद्र जो 18 एबट रोड पर दो मंजिले के किराए के मकान से शुरु हुआ था। सुनने में शायद यह अजीब लगे लेकिन छोटे से सफर से हुई शुरुआत आज 80 साल के सुरीले सफर में तब्दील हो चुकी है। मेरी इमारत की भीतरी सफेद रंग की दीवारों से पटी शहर की मशहूर शख्सियतों की तस्वीरें मेरे सफर का एक खूबसूरत आयाम भर नहीं है, मेरे होने का वजूद हैं। मैं उस वक्त लोगों की आवाज का सशक्त माध्यम बनकर उभरा था और आज भी इस किरदार को बाखूबी निभा रहा हूं। मैंने शहर की तहजीब, नजाकत, नफाजत और जुबां को अपने अंदाज में जिंदा रखा और यही अंदाज-ए-जुबां मुझे बाकी आकाशवाणी केंद्रों से जुदा करते हैं। अपने तारुफ की सेवा समाप्त करते हुए आपको कुछ अनसुने किस्सों से रूबरू करवाता हूं:

और मैं पांच मिनट देरी से शुरु हुआ: अपने वजूद में आने का आपको सबसे दिलचस्प किस्सा सुनाता हूं। 2 अप्रैल 1938 को मेरी नींव रखी गई। मेरे पहले निदेशक ए.आडवाणी और चीफ इंजिनियर ए.वैंकटेश्वर थे। उस वक्त उत्तर प्रदेश, यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध हुआ करता था और सीएम प्राइम मिनिस्टर हुआ करते थे। पंडित गोविंद वल्लभ पंत यहां के प्राइम मिनिस्टर थे जिन्हें शाम साढ़े छह बजे मेरा उद्घाटन करना था। एच.आर.लूथरा प्रमुख कार्यक्रम अधिकारी थे। इस मौके लिए खासतौर पर लियोनल फील्डन शहर आए थे। प्रोग्राम वक्त से शुरु हो इसलिए बार बार मुख्यमंत्री आवास पर फोन किया जा रहा था, और जवाब कि बस निकल रहे हैं। यहां सिग्नेचर ट्यून बजनी शुरू हो गई लेकिन प्राइम मिनिस्टर का कुछ पता नहीं था। 6:32 मिनट पर प्राइम मिनिस्टर की कार आई। स्टूडियो तक जाने में वक्त लगेगा, सोचकर फील्डन ने लूथरा को आदेश दिया कि वह कंट्रोल रूम में जाकर एक रिकॉर्ड बजा दें। जो रिकॉर्ड उस वक्त बजा उसके बोल थे 'प्रभु राखों भक्तों की लाज'। लाज तो प्रभु ने रख ली थी लेकिन मैं देश का ऐसा पहला केंद्र बन गया जो अपने तय समय से पांच मिनट देरी से शुरु हुआ।

उस वक्त रमई काका किरदार ने धूम मचा दी थी: चूंकि मैं अकेला रेडियो स्टेशन था, सो ठोक बजा कर उद्घोषक रखे जा रहे थे। उन्नाव जिले के चन्द्रभूषण त्रिवेदी की एक मंडली थी जो गाती- बजाती थी। जिन्हें सुनने के बाद सन 1941 को नौकरी पर रखा गया। उन्हें 'पंचायत घर' प्रोग्राम का संचालन सौंपा गया। जिसमें उन्हें काका बनना था। चूंकि वह राम के भक्त थे सो उन्होंने 'रमई काका' नाम से प्रोग्राम संचालित किया। 1942 में रमई काका की 'बौछार' में प्रकाशित 'हम कहा बड़ा ध्वाखा हुइगा' कविता ने खूब चर्चा बटोरी। उसी दौरान रमई काका ने बहरे बाबा नाम से नाटक लिखना शुरू किया जो तकरीबन 41 सालों तक प्रसारित होता रहा। इसके अलावा 1948-49 में बच्चों के लिए बालसंघ प्रोग्राम ने भी खूब तारीफ बटोरी। ग्रामीण महिलाओं के लिए पनघट और शहरी महिलाओं के लिए गृहलक्ष्मी पसंदीदा प्रोग्राम थे।

विविध भरती ने मुझे जीने के नए आयाम दिए: उस वक्त तक दूरदर्शन आ चुका था। अब लोगों के पास एक ऐसा साधन था, जिसमें वो तस्वीरें भी देख सकते थे। ऐसे में मेरे वजूद पर कुछ तो असर होना ही था। लेकिन जब 1957 में मेरे साथ विविध भारती जुड़ा, तो वक्त जैसे बदल गया। देखते ही देखते विविध भारती के फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रम घर-घर में गूंजने लगे। फिल्मी कलाकारों से मुलाकात, फौजी भाइयों के लिए 'जयमाला', 'हवा महल' के नाटक जैसे कार्यक्रम लोगों के जीवन का हिस्सा बनते गए। 1967 में विविध भारती से प्रायोजित कार्यक्रमों की शुरुआत हुई और मेरी लोकप्रियता शिखर पर पहुंच गई। मुझे पता है, अमीन सयानी की "बिनाका गीतमाला" आज भी आपकी यादों का हिस्सा है।

मैं नाटकों का एक अलग फ्रेम था: मैं अपने नाटको की वजह से भी चर्चा में रहा हूं। तब कहा जाता था कि मेरे यहां नाटक करने लोग कोलंबो से आते थे। अपने नाटको की वजह से मैं लाहौर के बाद सबसे ज्यादा पहचाना जाता था। यहां अमृतलाल नागर जैसे बड़े साहित्यकारों ने नाटकों का लेखन और संपादन किया। राधे बिहारी लाल श्रीवास्तव,मुख्तार अहमद, पी.एच.श्रीवास्तव, शहला यास्मीन, आसिफा जमानी, प्रमोद बाला और हरिकृष्ण अरोड़ा जैसे नाटक कलाकारों का कोई सानी नहीं हुआ। यहीं से विमल वर्मा, विजय वास्तव, अनिल रस्तोगी, शीमा रिजवी, कुमकुमधर और संध्या रस्तोगी नाटक के दिग्गज कलाकार हुए हैं।

कलाकर जो मुझसे जुड़े रहें: बेगम अख्तर, तलत महमूद, बिस्मिल्लाह खां, उस्ताद अली अकबर, मदन मोहन, सुशीला मिश्र, विनोद कुमार चटर्जी, विद्यानाथ सेठ, इकबाल अहमद सिद्दीकी, आलोक गांगुली, मोहम्मद यरकूब, सर्वेशवर दयाल सक्सेना, गरिजा कुमार माथुर, भगवती चरण वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, रमानाथ अवस्थी, पंडित मदन मोहन मालवीय, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, जोश मलिहाबादी, जिगर मुरादाबादी, असर लखनवी, मजाज और शकील बदायूंनी।

बिस्मिल्लाह खां मेरे दरवाजे पर माथा टेकते थे: शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां प्रोग्राम करने कहीं भी जा रहे हों वह अपना सफर रोक कर मेरे मुख्य द्वार पर सजदा करते हुए और मेरे परिसर में किशन द्ददा से मिले बगैर कहीं नहीं जाते थे। उनके दिल में यह बात थी कि उन्हें बनाने में मैंने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

आइए इनकी भी सुनें:

तब कैसरबाग फोन एक्सचेंज ब्लॉक हो जाते थे: यूं तो लखनऊ आकाशवाणी केंद्र से मेरा बचपन से ही नाता रहा है। लेकिन मेरे जेहन में एफएम आने के बाद जो यादें बसी हैं वो बहुत खास हैं। 20 अगस्त 2000 से 100.7 मेगाहर्ट्ज पर जब एफएम का प्रसारण हुआ तो इसे रेडियो के पुनर्जन्म का नाम दिया गया। यह पूरी तरह से इंटरटेनमेंट चैनल हुआ करता था। इनमें से हैलो एफएम लाइव फोन इन प्रोग्राम काफी पॉपुलर हुआ। आप यूं समझिए कि आधे घंटे के प्रोग्राम के दौरान कैसरबाग फोन एक्सचेंज ब्लॉक हो जाया करता था। हमारे पास शिकायतें आती थी कि आपका फोन नहीं मिलता। इसके अलावा गुडमॉर्निंग लखनऊ और एफएम मेहमान कार्यक्रम ने भी उस वक्त खूब धूम मचाई थी। एफएम मेहमान के हमारे पहले मेहमान के.पी.सक्सेना थे। मैं ही तीनों प्रोग्राम का संचालन करती थी। हालांकि मैं उस वक्त ऑफिसर पद पर तैनात थी लेकिन लोग मुझे उद्घोषक ही समझते थे।
-रमा अरूण त्रिवेदी, प्रोग्राम हेड, दूरदर्शन

आकाशवाणी लखनऊ साहित्य और कला का पर्याय है: मैंने 1969-2002 तक लखनऊ आकाशवाणी में सेवा दी है। यहां की खासियत रही कि इसने कला के पारखियों को तलाशा और उन्हें खुद से जोड़ा। इस तलाश में डिग्रियों की कभी कोई जगह नहीं रही। जिसकी वजह से हमारे साथ वो लोग भी जुड़े जो कभी स्कूल तक नहीं गए। इनमें ढोलक वादक बफाती भाई जैसे कई नाम शामिल है। दूसरा यहां के प्रोग्राम के किरदार बहुत पॉपुलर हुए। जैसे पंचायत घर के रमईकाका, पलटू/ झपेटे, बालसंघ के रज्जन लाल उर्फ भैय्या और दीदी के किरदार। प्रोग्राम की बात करूं तो पत्र के लिए धन्यवाद और प्रसारित नाटकों को श्रोताओं का खूब प्यार मिला।
-शारदा लाल, रिटायर्ड प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव, आकाशवाणी

बेगम अख्तर को दी नई जिन्दगी: गजल गायिका अख्तरी बाई फैजाबादी ने 1945 में बैरिस्टर इश्ताक अहमद अब्बासी से निकाह किया। जब दोनों के बीच शादी की बात हुई तो शर्त रखी गई कि वह संगीत से रिश्ता तोड़ लेंगी। जिस पर बेगम अख्तर राजी हो गई। लेकिन 5 साल तक आवाज की दुनिया से दूर रहने का सदमा वह बर्दाश्त न कर सकीं और बीमार रहने लगीं। हकीम और डॉक्टर की दवा ने भी कोई असर न किया, नतीजन उनकी तबियत बिगड़ने लगी। हालातों को देखकर पति और घर वालों ने आकाशवाणी में गाने की इजाजत दे दी। पहला प्रोग्राम ठीक से न गा सकने की वजह से अखबार में उनकी काबिलियत पर उंगली उठाई गई। लेकिन उसके बाद आकाशवाणी की वजह से उन्होंने अपनी खोई पहचान वापस पा ली।

-पृथ्वी राज चौहान, स्टेशन डायरेक्टर, आकाशवाणी

हमारी शैली आज भी वही है: आकाशवाणी का अब तक का सफर बहुत शानदार रहा है। आज भी हम अपनी पुरानी शैली पर काम कर रहे है शालीन भाषा का प्रयोग करना हमारी कोशिश रहती है। हमारे पुराने प्रोग्राम के नाम जरूर बदल गए है लेकिन कंटेंट में कोई बदलाव नहीं है।

अनुपम पाठक, हेड प्रोग्रामिंग एग्जीक्यूटिव, आकाशवाणी



Forwarded by :- Jhavendra Kumar Dhruw ,jhavendra.dhruw@gmail.com

FADING ROMANCE WITH SHORTWAVE LISTENING

HARJAP SINGH AUJLA 

Since the first decade of the twentieth century, the scientific community of the Occidental world was constantly trying to unite the world through the propagation and reception of radio signals. The First World War seriously disrupted this research. Soon after the war Guglielmo Marconi, a physicist from Italy, decided to explore lower wavelengths than the 200 meters to 500 meters spectrum to reach longer distances in propagation. In 1924, he succeeded in receiving signals from Great Britain to his personal yacht in the waters off Cyprus. Soon his team was able to distinguish shortwaves from medium-waves and the advanced countries started getting regular signals from each other. During the 1939-45 World War II, Germany, the USA and Great Britain used the shortwave frequencies extensively to reach far off territories. During the World War II India received its first shortwave transmitters in the cities of Calcutta, Bombay, New Delhi and Madras. These transmitters were necessary for domestic service as well as to reach the far off countries like Malaya, Indo-China (Indonesia), Australia and New Zealand. 

My romance with shortwave listening started at age five, when I discovered two bamboo poles and a naked copper wire hung tight between the two on the roof top of our house at Kapurthala. Curiously I asked my father about it. My father by nature was very patient with the kids. He told me that the only role of the two bamboo poles was to keep the copper wire erect and sufficiently above the roof of the house. He further explained that the naked copper wire was picking up the shortwave signals from far away lands and a lead wire from the middle of the naked wire was conveying the signals to the radio receiver, which was converting it into listenable sound. From that day my romance with the outdoor radio aerial started. From then on, where-ever we lived, I did not forget to install a roof-top aerial. 

The first shortwave station I picked up was the Commercial Service (in Hindi) of Radio Ceylon, Colombo in 1950. This radio station invariably broadcast the finest film music of India, which I liked. There were no electronic toys during those days. The radio was my version of the electronic toys. As I grew up, I started experimenting by discovering other radio stations. My father was fond of listening to the BBC World Service. Later on he developed a taste for the Voice of America service too. During late 1950s and up to the end of 1970s, the easiest station to tune in was Radio Moscow. Later on I discovered that Radio Moscow was effectively targeting India with its shortwave transmitters located nearby in Uzbekistan, Turkmenistan and Tajikistan. Irrespective of the constraints of the sun-spot cycles, Radio Moscow used to broadcast on all the international bands like 13, 16, 19, 22, 25, 31, 41 and 49 meters. They were wasting a lot of power in this process. They also possessed the highest powered transmitters. The BBC was coming to India via London, Cyprus and Singapore. The Voice of America was reaching India via Phillipines and Sri Lanka. I learnt the complicated technicalities much later, but I did enjoy hard to tune in shortwave listening. The only days on which I could freely pursue my listening hobby were the Saturdays and Sundays, which I always looked forward to. My parents were always supportive of my hobby and they seldom interfered with my rarest of rare interest. 

During the mid-fifties, between 1 and 2pm, I discovered a powerful reception of the shortwave service of Radio Pakistan Karachi broadcasting in the 31 meter band. The sound was loud and clear and their choice of Hindustani film music was outstanding. These broadcasts were directed at audiences in Northern Pakistan, the directional shortwave radiation could easily reach Indian Punjab. 

Hardly any one knows that East Punjab got its first shortwave transmitter in late 1950s, when a low powered auxiliary station was opened in Simla. It was meant to cover the hill areas of Punjab along with the adjoining hill areas of the then very small state of Himachal Pradesh. Subsequently All India Radio Shimla has become a powerful radio station with two more decently strong medium-wave and FM transmitters in addition to the shortwave transmitter. 

During the Indo-Pak 1965 war, when ever the air raid sirens were sounded in Punjab, the medium-wave service of All India Radio Jullundur was temporarily taken off, it was simultaneously replaced by a shortwave transmitter kept on a stand by mode by All India Radio Delhi. This hide and seek went on throughout the war. A similar arrangement was done during the 1971 Bangladesh War. Of course Radio Pakistan was doing the same to avoid detection of medium-wave transmitters by the Indian bombers. 

The post World War II cold war was mostly fought on the shortwaves of Radio Moscow and the Voice of America. The BBC World Service and Deutsche Welle from West Germany also weighed in favour of the Voice of America. During the conflict in the Suez Canal, the feeble voice of Radio Cairo was drowned in the powerful shortwave signals coming from Paris, London and America. 

According to Muazzam Siddiqi former Chief of the Voice of America Urdu Service, in Pakistan since 1950s the most popular international broadcasting service has been the Voice of America Urdu Service in shortwave frequencies. Similar views were expressed by Jagdish Sareen at one time Head of the Hindi Service of VOA, he told me that the Hindi Service of the BBC London was the most listened to service in India, the VOA was a close second. The popularity of shortwave was at its peak during the 70s and 80s. The most powerful shortwave stations were competing with each other in the prime target areas of the Indian Sub-continent, Europe and North America. Weaker stations were suppressed by the super-powered transmitters of the most powerful nations. At that time even China was drowned out too. 

By early 1980. I was in the USA and home sick too. I had never lived without my shortwave radio. The first gadget I bought was a powerful digital world band radio receiver made by Panasonic Company of Japan, which got me the General Oversees Service of All India Radio on 11620 Khz in the 25 meter band from a little after 1:00pm American Eastern Standard Time in New York/New Jersey and Washington D.C. area up to 5:30pm. I was amazed to find out that the USA has hundreds of thousands of shortwave enthusiasts even during the 1980s. Within America of course FM (Frequency Modulation) is the most popular mode of radio listening followed by medium-wave, which is called AM (Amplitude Modulation) in America. But the listeners of shortwave constitute a special class. Some of them are amateur broadcasters too. They have installed shortwave transmitting antennae outside their houses on their estates. For them shortwave will stay alive for ever. For external services no important country can communicate wthout shortwave. Due to vastly improved relations with India, the VOA Hindi Service has become a casuality. But due to daily occurring problems in Pakistan and the Middle-East, the durations of the Urdu Service and the Arabic Service of the VOA have increased in hours and transmitting capabilities. China still has long hours of shortwave broadcasting services for India. 

In India too, due to its enhanced international status, shorwave is still extensively in use for external broadcasts and domestic services like the Vividh Bharati Service for remote areas. But it must be admitted that for local coverage, FM has already replaced medium-wave and shortwave. Shortwave due to its inherant distortions in its reception is getting less popular. It can be sadly admitted that the romance with shortwave listening, which started during World War II and flourished during the 1950s, 60s, 70s and 80s is fading all over the world. Its listeners shall keep dwindling, but due to increasing research in direct radio modiale (DRM) and other technologies and owing to the obsession of the die-hard fans of shortwave listening, it will keep its flag fluttering high in the sky. India is also using DRM for its medium-wave and shortwave services. Some countries, barring the most powerful ones, have pulled out of the shortwave spectrum, so it is much less congested now. India is loud and clear in USA. 


आकाशवाणी सवाई माधोपुर ने मनाया रेडियो किसान दिवस I


आकाशवाणी सवाई माधोपुर की ओर से एक मैरिज गार्डन में रेडियो किसान दिवस 2018 का आयोजन किया गया। केंद्राध्यक्ष एवं कार्यक्रम प्रमुख डॉक्टर अर्चना सिन्हा ने बताया कि आकाशवाणी सवाई माधोपुर से प्रसारित किसान वाणी कार्यक्रम जो कि केन्द्रीय कृषि एवं किसान मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रायोजित होता है किसान वाणी की ओर से प्रतिवर्ष किसानों की ओर से रेडियो किसान दिवस का आयोजन किया जाता है। केंद्राध्यक्ष ने इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए किसानों का स्वागत किया।कार्यक्रम में जिले के किसानों सहित पशुपालक, जिले के कृषि, उद्यान, पशुपालन, बैंक, बीमा, डेयरी से जुड़े विशेषज्ञों एवं जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भाग लिया। इस अवसर पर उपस्थित किसानों को संबोधित करते हुए उपखंड अधिकारी ने आकाशवाणी द्वारा किसानों की जानकारी एवं ज्ञान वर्धन के लिए उपयोगी कार्यक्रम के प्रसारण की सराहना करते हुए किसानों से इसका भरपूर लाभ उठाने का आव्हान किया।किसान वाणी कार्यक्रम प्रभारी अशोक कुमार गोयल ने किसान वाणी कार्यक्रम का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक बालकृष्ण शर्मा ने किया। इस अवसर पर कई लोग मौजूद थे।

Forwarded by :- Jhavendra Kumar Dhruw ,jhavendra.dhruw@gmail.com

PB RISING STARS:NIHALI PANDEY EA , AIR JAGDALPUR


About 3 years back as I stepped inside clean and tidy office premises of AIR Jagdalpur, I was totally unaware of what is going to happen next.

After joining and taking my oath, l came to meet the people of my new office, all of them very helpful and supportive. The work culture here is very good. Engineering staff helped me to understand and learn all the necessary things required to perform the shift duties.

With the blessings of goddess Danteshwari, I kept honing my skills everyday and hope to do so in future. Using radio communication as a tool, I will keep serving the people of Bastar till my last day here at Akashvani Jagdalpur

NIHALI PANDEY ,EA AIR JAGDALPUR

PB parivar Blog gives an opportunity to latest Joinees to share their experiences on this platform. Any new employee, who has joined in past 3 years can send similar matter for possible publication on PB Parivar blog at rashmi.rimjhim80@gmail.com

PB Parivar Blog Membership Form